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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
अहं तु निहतामात्यो हतपुत्रश्च सञ्जय़ |  ५३   क
द्यूततः कृच्छ्रमापन्नो लूनपक्ष इव द्विजः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति