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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
यथा हि शकुनिं गृह्य छित्त्वा पक्षौ च सञ्जय़ |  ५४   क
विसर्जय़न्ति संहृष्टाः क्रीडमानाः कुमारकाः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति