वन पर्व  अध्याय ३७

वैशम्पाय़न उवाच

एवमुक्त्वा प्रपन्नाय़ शुचय़े भगवान्प्रभुः |  ३४   क
प्रोवाच योगतत्त्वज्ञो योगविद्यामनुत्तमाम् ||  ३४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति