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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
यस्य सर्पमुखो दिव्यः शरः कनकभूषणः |  ६६   क
अशेत निहतः पत्री चन्दनेष्वरिसूदनः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति