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स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधमाहारय़च्चैव तीव्रं धर्मसुतो नृपः |  ५०   क
देवांश्च गर्हय़ामास धर्मं चैव युधिष्ठिरः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति