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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
को हि शक्तो रणे कर्णं विधुन्वानं महद्धनुः |  ७४   क
विमुञ्चन्तं शरान्घोरान्दिव्यान्यस्त्राणि चाहवे |  ७४   ख
जेतुं पुरुषशार्दूलं शार्दूलमिव वेगितम् ||  ७४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति