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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
यस्य नासीद्भय़ं पार्थैः सपुत्रैः सजनार्दनैः |  ८१   क
स्ववाहुवलमाश्रित्य मुहूर्तमपि सञ्जय़ ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति