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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
स नूनमृषभस्कन्धं दृष्ट्वा कर्णं निपातितम् |  ८६   क
दुःशासनं च निहतं मन्ये शोचति पुत्रकः ||  ८६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति