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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
दुर्मर्षणं हतं श्रुत्वा वृषसेनं च संय़ुगे |  ८८   क
प्रभग्नं च वलं दृष्ट्वा वध्यमानं महारथैः ||  ८८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति