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शल्य पर्व
अध्याय ५
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सञ्जय़ उवाच
कान्तिरूपमुखैश्वर्यैस्त्रिभिश्चन्द्रमसोपमम् |  ११   क
काञ्चनोपलसङ्घातैः सदृशं श्लिष्टसन्धिकम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति