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शल्य पर्व
अध्याय ५
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सञ्जय़ उवाच
दशाङ्गं यश्चतुष्पादमिष्वस्त्रं वेद तत्त्वतः |  १४   क
साङ्गांश्च चतुरो वेदान्सम्यगाख्यानपञ्चमान् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति