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शल्य पर्व
अध्याय ५
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सञ्जय़ उवाच
आराध्य त्र्यम्वकं यत्नाद्व्रतैरुग्रैर्महातपाः |  १५   क
अय़ोनिजाय़ामुत्पन्नो द्रोणेनाय़ोनिजेन यः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति