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शल्य पर्व
अध्याय ५
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सञ्जय़ उवाच
यं पुरस्कृत्य सहिता युधि जेष्याम पाण्डवान् |  १७   क
गुरुपुत्रोऽद्य सर्वेषामस्माकं परमा गतिः |  १७   ख
भवांस्तस्मान्निय़ोगात्ते कोऽस्तु सेनापतिर्मम ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति