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वन पर्व
अध्याय १९४
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मार्कण्डेय़ उवाच
अथापश्यत गोविन्दो दानवौ वीर्यवत्तरौ |  १८   क
दृष्ट्वा तावव्रवीद्देवः स्वागतं वां महावलौ |  १८   ख
ददानि वां वरं श्रेष्ठं प्रीतिर्हि मम जाय़ते ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति