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शल्य पर्व
अध्याय ५
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द्रौणिरु उवाच
अय़ं स कालः सम्प्राप्तो मित्राणां मित्रवत्सल |  २३   क
यत्र मित्रममित्रं वा परीक्षन्ते वुधा जनाः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति