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शान्ति पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
संसारश्चैव भूतानां धर्मस्य च फलोदय़ः |  १९   क
विदितस्ते महाप्राज्ञ त्वं हि व्रह्ममय़ो निधिः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति