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शान्ति पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
अहो रामस्य वार्ष्णेय़ शक्रस्येव महात्मनः |  २   क
विक्रमो येन वसुधा क्रोधान्निःक्षत्रिय़ा कृता ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति