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शान्ति पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि सर्वैर्गुणै राजन्देवानप्यतिरिच्यसे |  २९   क
तपसा हि भवाञ्शक्तः स्रष्टुं लोकांश्चराचरान् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति