वन पर्व  अध्याय ७८

वृहदश्व उवाच

वेदाक्षहृदय़ं कृत्स्नमहं सत्यपराक्रम |  १५   क
उपपद्यस्व कौन्तेय़ प्रसन्नोऽहं व्रवीमि ते ||  १५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति