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शान्ति पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
स पाण्डवेय़स्य मनःसमुत्थितं; नरेन्द्र शोकं व्यपकर्ष मेधय़ा |  ३६   क
भवद्विधा ह्युत्तमवुद्धिविस्तरा; विमुह्यमानस्य जनस्य शान्तय़े ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति