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शान्ति पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
अहो धन्यो हि लोकोऽय़ं सभाग्याश्च नरा भुवि |  ४   क
यत्र कर्मेदृशं धर्म्यं द्विजेन कृतमच्युत ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति