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शान्ति पर्व
अध्याय २६३
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कुण्डधार उवाच
पृथिवीं रत्नपूर्णां वा महद्वा धनसञ्चय़म् |  २४   क
भक्ताय़ नाहमिच्छामि भवेदेष तु धार्मिकः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति