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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
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व्रह्मो उवाच
समेन सर्वभूतेषु निःस्पृहेण निराशिषा |  ३८   क
शक्या गतिरिय़ं गन्तुं सर्वत्र समदर्शिना ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति