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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
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वासुदेव उवाच
कृतकृत्यश्च स तदा शिष्यः कुरुकुलोद्वह |  ४३   क
तत्पदं समनुप्राप्तो यत्र गत्वा न शोचति ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति