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वन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्विता धर्मराजेन प्रसेदुः क्षणदाचराः |  ३१   क
विदिताश्च कुवेरस्य ततस्ते नरपुङ्गवाः |  ३१   ख
ऊषुर्नातिचिरं कालं रममाणाः कुरूद्वहाः ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति