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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
समेत्य तत्र राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् |  ५१   क
समनुज्ञाप्य दुर्धर्षं स्वां पुरीं यातुमर्हसि ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति