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सभा पर्व
अध्याय ५०
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दुर्योधन उवाच
शत्रुपक्षं समृध्यन्तं यो मोहात्समुपेक्षते |  २३   क
व्याधिराप्याय़ित इव तस्य मूलं छिनत्ति सः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति