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सभा पर्व
अध्याय ५०
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दुर्योधन उवाच
अल्पोऽपि ह्यरिरत्यन्तं वर्धमानपराक्रमः |  २४   क
वल्मीको मूलज इव ग्रसते वृक्षमन्तिकात् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति