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सभा पर्व
अध्याय ५०
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दुर्योधन उवाच
अतादृशस्य किं मेऽद्य जीवितेन विशां पते |  २८   क
वर्धन्ते पाण्डवा नित्यं वय़ं तु स्थिरवृद्धय़ः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति