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सभा पर्व
अध्याय ५०
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धृतराष्ट्र उवाच
आहरिष्यन्ति राजानस्तवापि विपुलं धनम् |  ५   क
प्रीत्या च वहुमानाच्च रत्नान्याभरणानि च ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति