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वन पर्व
अध्याय ५०
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वृहदश्व उवाच
न देवेषु न यक्षेषु तादृग्रूपवती क्वचित् |  १३   क
मानुषेष्वपि चान्येषु दृष्टपूर्वा न च श्रुता |  १३   ख
चित्तप्रमाथिनी वाला देवानामपि सुन्दरी ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति