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वन पर्व
अध्याय ५०
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वृहदश्व उवाच
तय़ोरदृष्टकामोऽभूच्छृण्वतोः सततं गुणान् |  १६   क
अन्योन्यं प्रति कौन्तेय़ स व्यवर्धत हृच्छय़ः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति