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वन पर्व
अध्याय ५०
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वृहदश्व उवाच
स ददर्श तदा हंसाञ्जातरूपपरिच्छदान् |  १८   क
वने विचरतां तेषामेकं जग्राह पक्षिणम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति