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वन पर्व
अध्याय ५०
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वृहदश्व उवाच
एवमुक्तस्ततो हंसमुत्ससर्ज महीपतिः |  २१   क
ते तु हंसाः समुत्पत्य विदर्भानगमंस्ततः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति