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वन पर्व
अध्याय ५०
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वृहदश्व उवाच
दमय़न्ती तु यं हंसं समुपाधावदन्तिके |  २५   क
स मानुषीं गिरं कृत्वा दमय़न्तीमथाव्रवीत् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति