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वन पर्व
अध्याय ५०
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वृहदश्व उवाच
वय़ं हि देवगन्धर्वमनुष्योरगराक्षसान् |  २८   क
दृष्टवन्तो न चास्माभिर्दृष्टपूर्वस्तथाविधः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति