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वन पर्व
अध्याय ५०
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वृहदश्व उवाच
त्वं चापि रत्नं नारीणां नरेषु च नलो वरः |  २९   क
विशिष्टाय़ा विशिष्टेन सङ्गमो गुणवान्भवेत् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति