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विराट पर्व
अध्याय ५०
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अर्जुन उवाच
नागकक्ष्या तु रुचिरा ध्वजाग्रे यस्य तिष्ठति |  १५   क
एष वैकर्तनः कर्णो विदितः पूर्वमेव ते ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति