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विराट पर्व
अध्याय ५०
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अर्जुन उवाच
यस्तु नीलानुसारेण पञ्चतारेण केतुना |  १७   क
हस्तावापी वृहद्धन्वा रथे तिष्ठति वीर्यवान् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति