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विराट पर्व
अध्याय ५०
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अर्जुन उवाच
ततोऽभ्यवहदव्यग्रो वैराटिः सव्यसाचिनम् |  २३   क
यत्रातिष्ठत्कृपो राजन्योत्स्यमानो धनञ्जय़म् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति