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विराट पर्व
अध्याय ५०
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अर्जुन उवाच
लोहिताक्षमरिष्टं यं वैय़ाघ्रमनुपश्यसि |  ४   क
नीलां पताकामाश्रित्य रथे तिष्ठन्तमुत्तर ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति