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उद्योग पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रस्यापि भय़ं ह्येते जनय़ेय़ुर्महाहवे |  ४०   क
किं पुनर्धार्तराष्ट्राणां लुव्धानां पापचेतसाम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति