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उद्योग पर्व
अध्याय ५०
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धृतराष्ट्र उवाच
ऋषय़ो ह्यपि निर्मुक्ताः पश्यन्तो लोकसङ्ग्रहान् |  ५४   क
सुखे भवन्ति सुखिनस्तथा दुःखेन दुःखिताः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति