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भीष्म पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
शक्रदेवस्तु समरे विसृजन्साय़कान्वहून् |  २०   क
अश्वाञ्जघान समरे भीमसेनस्य साय़कैः |  २०   ख
ववर्ष शरवर्षाणि तपान्ते जलदो यथा ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति