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भीष्म पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
कलिङ्गस्तु ततः क्रुद्धो धनुर्ज्यामवमृज्य ह |  २६   क
प्रगृह्य च शरं घोरमेकं सर्पविषोपमम् |  २६   ख
प्राहिणोद्भीमसेनाय़ वधाकाङ्क्षी जनेश्वरः ||  २६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति