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भीष्म पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
अश्ववृन्देषु नागेषु रथानीकेषु चाभिभूः |  ४०   क
पदातीनां च सङ्घेषु विनिघ्नञ्शोणितोक्षितः |  ४०   ख
श्येनवद्व्यचरद्भीमो रणे रिपुवलोत्कटः ||  ४०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति