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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
ते स्तुवन्तश्च विप्राग्र्याः केशवं पुरुषोत्तमम् |  ६७   क
भीष्मं च शनकैः सर्वे प्रशशंसुः पुनः पुनः ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति