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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
अपि स्वस्ति भवेदद्य भ्रातृभ्यो मम माधव |  १४   क
न हि शुध्यति मे भावो दृष्ट्वा स्वजनमाकुलम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति