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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
अपि पाञ्चालराजस्य विराटस्य च मानद |  १५   क
सर्वेषां चैव योधानां सामग्र्यं स्यान्ममाच्युत ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति