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वन पर्व
अध्याय २३८
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वैशम्पाय़न उवाच
शूराश्च वलवन्तश्च संय़ुगेष्वपलाय़िनः |  ४४   क
भवतस्ते सभाय़ां वै प्रेष्यतां पूर्वमागताः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति